मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना
गुण तो न था कोई भी, अवगुण मेरे भुला देना.....
चलचित्र: बंदिनी, १९६०
कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर
आपकी याद आती रही रात भर॥
चलचित्र: गमन, १९७५
कुछ खटक सी हुई क्या आपके जेहन में इन पंक्तियों को पढ़ कर?
मेरा हमेशा से यह मानना रहा है की सभी कलाओं के शीर्ष का दौर था १९६० और १९७० के दशक। यह बात सिर्फ़ भारतीय परिपेक्ष्य में हीं नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए सही है। आप मेरी बात से असहमत हो सकते हैं। आप शायद मुझे पुरातनपंथी भी कह सकते हैं। लेकिन मैं अपनी राय नहीं परिवर्तित कर रहा ।
हिन्दी चलचित्रों और उनके संगीत के लिए भी यहीं सही है। क्या दशक था वो...शंकर-जय किशन, नौशाद, सचिन देव बर्मन, नैय्यर साहब जैसे लोकप्रिय संगीतकार...जब दूसरी पंक्ति, या यूँ कहें की लोकप्रियता की दूसरी पंक्तियों में कल्याणजी-आनंदजी, उभरते हुए से लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, दत्ताराम, खेमचंद प्रकाश, खैय्याम, रवि, रोशन, जैसे संगीतकार....गीतकारों में शैलेंद्रजी, साहीर साहब, मजरूह साहब, शकील साहब...सही कहते हैं पापा और उनके दोस्त...स्वर्णिम दिन रहे होंगे वो...
लेकिन इनमे से भी मेरी एक खास पसंद है...सचिन साहब...सचिन देव बर्मन। जब से गानों मी दिलचस्पी जगी, कई गाने गुनगुनाने की आदत सी हुई। फिर एहसास हुआ की सब में एक बात थी...सभी सचिन दा के गीत निकले। मुझे उनके द्वारा निर्देशित गानों से अधिक उनके गाए हुए गाने में उत्सुकता जागी। इसे पढिये...
कोई भी तेरी
राह न देखे
नैन ना बिछाए कोई
दुःख में तेरे कोई ना तड़पा
आँख ना किसी की रोई
कहे किसे तू अपना,
मुसाफिर, तू जाएगा कहाँ...
चलचित्र: गाइड, १९६५
और इसे भी...
होता जो पीपल तू मैं होती अमर-लता तेरी
तेरे गले की माला बन कर पड़ी इतराती...
सुन मेरे साथी...
होता जो सागर तू मैं होती तेरी नदिया
ठुमक ठुमक (?) कर पिया को मिलाने जाती....
चलचित्र: सुजाता, १९६३
कुछ अलग सा नहीं है...कुछ ऐसा जोकि शायद अंग्रेजी में "Melancholy" और "Haunting" शब्दों से अधिक अच्छे से परिभाषित और बोधित होता है....
7.4.08
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