मुम्बई बीमार है। मेरे नजरिये से तो यह काफी बीमार है। अगर समय रहते इसके उपचार नहीं हुआ तो ये दम तोड़ देगी। शायद एक और कलकत्ता बन जाए यह...या कुछ और वैसा हीं... शायद अभी भी याद हुआ लोगों को करीब ३० साल पहले तक, कलकत्ता भारत का सबसे बड़ा शहर हुआ करता था और नौकरी की तलाश में लोग मुम्बई या दिल्ली नहीं, बल्कि कलकत्ता जाया करते थे। भारत की पहली मेट्रो ट्रेन परियोजना भी कलकत्ता में कार्यान्वित की गई थी।
मैं मुम्बई में पिछले छः वर्षों से रह रहा हूँ और इसे पिछले दस वर्षों से अनुपालन कर रहा हूँ। स्तिथि तो बाद से बदतर हीं हुए जा रही है मुम्बई की। मैंने मुछ विचार किया इस पर। आख़िर मुम्बई की ऐसी दुर्दशा क्यों हो रही है? कौन जिम्मेदार है इसके लिए? मैंने कोशिश तो यहीं किया कि निष्पक्ष रहूँ अपने आंकलन में। देखे क्या निकलता है इस परीक्षण का परिणाम।
जब मैंने पहली बार मुम्बई में कदम रखा था तो काफी घबराया हुआ सा था। लगता था की इतनी भीड़ में क्या हाल होगा मेरा। पता नहीं लोग सहायता के लिए भी आगे आयेंगे या नहीं इस नवागंतुक के। लेकिन डर सहीं नहीं साबित हुआ। मैं भीड़ में खोया नहीं। लोगों ने भी सहायता की जहाँ भी जरूरत पड़ी। यह १९९८-९९ की बात है। लोगों में उम्मीदें थीं। सांत्वना देते थे कि मुम्बई सुधर रही है। कई परियोजनाएं चल रहीं थीं, मूलभूत सुविधाओं को सुधरने की। पुरानी सडकों को विस्तारिक किया जा रहा था। नयी सड़कें बन रहीं थीं। कई उद्दन-पूलों पर काम हो रहा था। लोगों में भविष्य के लिए उत्साह सा लगा। खैर मैं एक कार्य के सिलसिले में आया था। २-३ दिनों में लौट गया, इस उम्मीद के साथ कि शायद मैं भी कभी यहाँ रहूँ।
दिन बीते मैं आया यहाँ। सन् २०००-२००१ कि बात है। नौकरी के लिए। १ साल रहा। कई परियोजनाएं जो पिछले दौरे के दौरान अधूरी सुनी थीं, तब तक पूरी हो चुकी थीं। कईयों पर काम चल रहा था। लेकिन ऐसा लग रहा था कि शायद और कदम उठाने की जरूरत है। यह भी समझ आया कि अगर ये नयी योजनाएं कार्यान्वित नहीं हुईं होती तो हालत कितने बुरे होते। मेरी पिछले दौरे और इस बार के दिनों के बीच में मुम्बई का काफी विस्तार हो चुका था। और मुम्बई कि जनसंख्या भी करीब २०% से बढ़ चुकी थी। खैर, दिन बीते मैं मुम्बई से वापस चला गया।
२ साल बाद वापस लौटा। मुम्बई बदल चुकी थी। आबादी २५-३०% और बढ़ चुकी थी। और लगभग सारी परियोजनाएं जिनके बारे में सुना था पीचाली बार, वो पूरी हो चुकी थी। यह २००३ कि बात है। और, जैसा कि अनुमान था, इतनी परोयोजनाओं के कार्यान्वन के बाद भी मूल-भुत संरचयों पर दबाव बढ़ हीं रहा था। कुछ दिनों में यह भी अहसास हुआ कि मुम्बई के मूलभूत संरचनाओं में जीतनी भी बढोतरी की गई है, वो सिर्फ़ इसके विस्तार की पूर्ति करने लिए हीं पर्याप्त सिद्ध हुई हैं। हालत को सुधरने और जीवन को बेहतर बनाने या सिर्फ़ पुराने दर्जे तक लाने के लिए भी अभी और बहुत कुछ करने कि जरूरत है।
अब इस बात को पाँच साल बीत गए हैं। सिर्फ़ अहसास हीं आगे बढ़ा है। मेरे सामने तो मुम्बई की मूल-भुत संरचानों को बढ़ने के लिए कोई नई परियोजना का कार्यान्वन नहीं हुआ है। जीवन दिनों-दिन मुश्किल होता गया है।
अब मुझे हीं देखिये। इस विषय पर पिछले छः महीने से लिखने कि सोच रहा हूँ। लेकिन कभी समय नहीं है। पहले बारिश में कार्यालय जाने के लिए अधिक समय लगता था। बारिश बंद भी हो गई लेकिन अब समय उतना हीं लगता है। मुझे याद है कि २००३ में मुझे कार्यालय जाने में करीब १ घंटे लगते थे और वापस आने में १'१५ घंटे। अभी यह समय १.५ और २.५ हुआ चुका है। और मुझे पूरी उम्मीद है कि यह जल्द हीं सम्मिलित रूप से ५ घंटे का अवरोध भी तोड़ देगा। (और हमारे वित्त मंत्री जी का कहना है कि दैनिक कार्यकाल ८ से १२ घंटे कर देना चाहिए। भाई साहब पहले मूल-भुत सुविधाओं का हाल तो सुधारिए।॥:)) किसानों और दूसरों के कर्जे माफ करके उतना फायदा नहीं होगा जितना की कार्यकुशलता बढ़ने से। और कार्यकुशलता बढ़ने में मूलभूत सुविधाओं का बहुत हीं बड़ा योगदान होता है। आप तो वित्त मंत्री हैं। वित्त हमेशा से आपका कार्य-क्षेत्र रहा है। आपको भी बताना पड़ेगा ये सब???)
वैसे मुम्बई के इस हालत के मूल कारण क्या है?
- क्या यह कि यहाँ मुम्बई का कोई अपना नहीं है। यहाँ की जन संख्या में ३०- ३५% महाराष्ट्रियन, ३०-३५% गुजराती, और बाकी देश के विभिन्न प्रदेशों से आए लोगों का है। इन सभी लागों के लिए मुम्बई कार्य स्थल तो है पर अपना स्थल, या यूँ कहिये की अपनी जगह, नहीं? यह बात सिर्फ़ उत्तर या दक्षिण भारतीयों के लिए हीं नहीं बल्कि महाराष्ट्र के दूसरे हिस्से से आए लोगों के लिए भी लागू होती है। शायद इनमें से अधिकांश लोगों को यह परवाह हीं नहीं कि उन्हें भी मुम्बई को व्यवस्थित रखने के लिए कुछ जिम्मेदारी लेनी चाहिए। सिर्फ़ ऊँची आवाज़ में शिकायत करने से कुछ नहीं होगा।
- क्या यहाँ की कार्य-प्रणाली , जोकि बाहर से आए लोगों को जल्दी अपने में सम्मिलित नहीं होने नहीं देती, भी जिम्मेवार है? मेरे जैसे कई लोग हैं यहाँ जो कि वर्षों से मुम्बई के तो हैं पर उनके पास ऐसा कोई सरकारी दस्तावेज नहीं है जो उन्हें मुम्बई-वासी होने की मान्यता प्रदान करता हो। मेरेसाथ कुछ ऐसा हीं हुआ है। मेरे पास मुम्बई-निवासी होने का कोई प्रमाण-पत्र नहीं है। प्रमाण के रूप में मेरे पास या तो राशन कार्ड, या चुनाव पहचान पत्र, या ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए। मेरे पास इनमे से कुछ भी नहीं है। और मैं अगर चाहूँ तो भी मुझे यहाँ का राशन कार्ड नहीं मिल सकता क्यों कि मेरे पास मुम्बई या महाराष्ट्र का कोई स्थायी पता नहीं है। मुझे यहाँ का चुनाव पहचान पत्र नहीं मिल सकता क्योंकि मेरे पास राशन कार्ड या कोई ऐसा सरकारी दस्तावेज नहीं है जो कि मुझे मुम्बई-वासी होने की मान्यता प्रदान करता हो। और हालत तो यहाँ तक पहुँच गई थी कि मेरे शादी का पंजीकरण नहीं हुआ मुम्बई में, क्योंकि मेरे पास मुम्बई-वासी होने का कोई सरकारों प्रमाण नहीं था। वैसे यह भी बताया गया की मैं यह सब खरीद सकता हूँ। लेकिन विधिक तरीके से मुझे ये सब नहीं मिल सकता है। कार्य-प्रणाली बदलना बहुत बड़ी बात है। बड़े बड़े रूस्तम प्रणाली को बदलने के चक्कर में प्रणाली में शामिल हो कर प्रणाली में हीं खो गए। :)
- क्या यह सच्चाई कि महाराष्ट्र की सरकार में मुम्बई का कोई प्रभावशाली प्रतिनिधित्व नहीं है, मुम्बई के बुरे हाल के लिए जिम्मेदार हो सकती है? जरा ध्यान से याद कीजिये। शिवसेना कि सरकार में मुम्बई से चुने कितने हीं मंत्री थे? आख़िर मुम्बई शिव सेना-भाजपा का गढ़ हुआ करती थी। शायद यहीं कारण रहा हुआ कि मैंने जो भी परियोजनाओं कि बात की है ऊपर, वो मुम्बई में कार्यान्वित हुईं। अभी की सरकार, जोकि कांग्रेस की है, में मुम्बई की प्रतिनिधित्व शायद नाम मात्र की हीं है। शायद यहीं कारण हुआ कि पिछले दस वर्षों में मुम्बई में कोई बड़ी मूलभूत संरचानों के छेत्र में कोई बड़ी परियोजना नहीं आयीं है और नहीं कार्यान्वित हुई है? क्या यह बड़ा कारण नहीं हुआ सकता पिछले दस वर्षों में मुम्बई के पिछड़ने में? क्या मुम्बई के "भगवन" लोग कभी इस बात बार ध्यान भी देते हैं? या वह बस मुम्बई में मराठी-अमराठी की आग में झोंक कर सिर्फ़ अपनी रोटी हीं सकने में लगे रहेंगे? क्या कभी उन्होंने यह सोचा है कि मुम्बई के आज और अभी के स्वरूप में उनका कितने योगदान रहा है अराजनैतिक कारणों से? क्या उन्होंने कभी मुम्बई को कुछ दिया भी है या सिर्फ़ मुम्बई से लेते रहे हैं? और आगे भी ऐसे हीं मुम्बई की हाथ मरोड़ कर और भी हथियाने में लगे रहेंगे?
बेचारी मुम्बई। क्यों न इसे एक अलग राज्य बना गिया जाता है? आख़िर दिल्ली के नसीब भी तो तभी जगे। मुम्बई को क्यों पीछे रखा जाए? क्या इसका विरोध करने में महाराष्ट्र और मुम्बई के "भगवानों" का कुछ निजी हित है? अगर नहीं तो वो इसे भावनात्मक मुद्दा क्यों बनते हैं? क्यों नहीं इसे एक अलग राज्य बनने देते? आख़िर मुम्बई की हित तो इसी में है।
मुझे दुःख है इसके आज के हाल पर। मैं सिर्फ़ सहानुभूति नहीं जाताना चाहता हूँ। पर मैं शायद कुछ कर भी न पाऊं इसके लिए। सलाम मुम्बई। बाय मुम्बई। भगवान् तुम्हारा भला करे।
8.3.08
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