यह लो...मैं यहाँ लिखने बैठा और क्या लिखना था भूल गया....कितने दिनों से इंतजार कर रह था कि शनिवार को कुछ लिखना है और यह हाल हुआ है।
वैसे कल हमने निर्मल वर्मा की कहानियो पर आधारित नाट्य मंचन देखने का विचार किया था...तीन कहानियाँ...तीन नाटक..तीन एकांत...नहीं जा पाये। मन तो बहुत कर रह था पर नहीं जा पाये। कितनी अजीब सी बात है, अगर यहीं स्तिथी कुछ महिने पहले होती तो शायद मेरी इस लेख का विषय कुछ और ही होता..खैर जीवन है और उससे जुडी हुई "Choices"... कोई शिक़ायत नहीं..किसी से नहीं...खुद से भी नहीं।
वैसे निर्मल वर्मा और उनसे जुडी हुई "नयी कहानी" आंदोलन से एक शिक़ायत तो है मुझे...क्या इन सभी लेखकों के बूते यह नहीं हुआ कि वो हिंदी को हिन् अधिक विक्सित करते और अपनी भावनाओं और कथन को प्रस्तुत करते। आज हिंदी लेखन मरणासन्न है। क्या ये सभी लेखक भी इसमें प्रदत नहीं हैं? मुझे नहीं पता हैं...पर मुझे इतनी तो समझ है कि इन काबिल लेखकों के जाने के बाद हिंदी साहित्य में कुछ रुकन सा आ गया है। और, मेरी चिन्ता है कि ये कहीँ रूक ही ना जाये....
अभी और भी है बहुत कुछ लिखने को। शायद अगली बार....
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