अरे अरे अरे...ये मैं बच्चन साहब की जीवनी कि बात नहीं कर रहा....बस अपनी बात को प्रस्तुत करने कि कोशिश है ये शब्द...
अचानक हीं कुछ दिनों पहले मुझे आठवीं-नवीं कक्षा में पढी हुई कुछ कविताओं की याद आने लगी। थोड़ा आश्चर्यजनक सा लगा। कवितायेँ तो कभी भी मेरी पहली पसंद नहीं थीं...ना हीं अब हैं ... मुझे तो हमेशा से ही कहानियाँ हीं अधिक पसंद रहीं हैं?? और तो और, कविताओं में भी मुझे जो दो कवितायेँ याद आ रहीं है वो भी थोड़ी अलग सी ही कही जाएँगी...एक तो शायद शमशेर बहादुर सिंह जी की है....उसकी पंक्तियां कुछ ऐसी हैं...भोर का नभ था बहुत नीला, शंख जैसे........या जैसे रात का लीपा हुआ चौका जो अभी गीला पड़ा है... मुझे इन दो पंक्तियों के अलावा कुछ भी याद नहीं है। दुसरी कविता तो और भी मुश्किल से याद आ रही है...कवि का भी नाम याद नहीं। बस इतना सा याद है कि यह गंगा नदी के किनारे के किसी गाँव या किसी छोटे शहर के सुबह का वर्णन है। यह भी याद है कि उस समय भी मुझे ये दोनों कवितायेँ बहुत पसंद आयी थी, शायद उन दिनों कुछ पंक्तियां याद भी कर ली थीं।
वैसे उन्हीं दिनों की एक बात अभी भी याद है। अगर कोई कविता या गीत या पंक्तियां बहुत पसंद आये तो उसे याद नहीं करनी चाहिए, वो याद कर लेने के बाद कम पसंद आतीं हैं।
लेकिन क्या यह दर्शन जीवन के दुसरे आक्षेपों के लिए भी सही नहीं है?
लेकिन क्या यह दर्शन जीवन के दुसरे आक्षेपों के लिए भी सही नहीं है?
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